Monday, November 27, 2017

कोख से संसार तक बचे बेटी,ससम्मान जिये बेटी


अहसास जो पहला तेरा,
मेरी कोख में आने का,
पाया था,
मेरा तो सर्वस्व वही समाया था।

गर्भ में, हो मेरे बेटी,
आँखों ने यही सपना सजाया था।

टूट गयी थी,उस वक्त मैं,
जब अपनों ने तेरे,
तेरी पहचान का जिम्मा उठाया था।

गर हो कोख में बेटी,
तो उसकी हत्या का,
जो बेहूदा ख्वाब सजाया था।

इस बात का इल्म
जब मेरे कानों तक ,
आया था।

बिखर गयी मैं,
बहुत गिड़गिड़ाई थी मैं, की थी कई मिन्नतें,
ठुकरा दिया था मुझे, न समझा था मुझे,
तेरे अंत का फैसला सुना दिया था मुझे।

तुझे खोने के डर से,
वो पल ,मन बहुत घबराया था।

जब सपनों में मैंने ,
तेरे अस्तित्व का अहसाह पाया था।

आँखों में लिए आँसू,
तूने मुझे बुलाया था।
बचालो माँ ,बचालो माँ,
बस यही शब्द ,कानों में मेरे
गुनगुनाया था।

सोई हुई मेरी आँखों को,
उस वक्त तूने जगाया था।

कोख से संसार तक, तुझे बचाने का,
ससम्मान इस दुनिया में,जीवन दिलाने का,
जो वचन मैंने उठाया था।

अपने उस वचन,कर्तव्य की खातिर
घर ,समाज से लड़कर,
हर कष्ट को सहकर
तुझे वजूद में लाया था।

हर उस बंधन को तोड़कर
जो तुझे कैद कर,
तेरे सपनों को जिन्होंने,
हरना चाहा था।

मैंने दीवार बन, तेरी हस्ती का
जो चेहरा तुझे दिखाया था।

तुझे तेरे ,पैरो पर खड़ा करने का,
जो जिम्मा मैने उठाया था।
ससम्मान तू  ,जिये इस संसार में ,
बाइज्जत विदा हो अपने घर से,
हर खुशी प्राप्त हो तुझे,
ख्वाव जो आँखों में सजाया था।

पूरे दिल से वो,
हर वचन मैंने निभाया है,बेटी,
अब तुझे ये वचन लेना है,बेटी,
कोख से संसार तक बचे बेटी,ससम्मान जिये बेटी
                             ~प्रियंका"श्री"
                               7/10/17


2 comments:

  1. माँ का मन बिना लिंग भेदभाव केबबिल्कुल आपकी शब्दों में अनुभव करता होगा
    अहसास जो पहला तेरा,
    मेरी कोख में आने का,
    पाया था,
    मेरा तो सर्वस्व वही समाया था।
    अत्यंत ही संवेदनशील बेहद मनोहारी कृति है आपकी प्रियंका श्री जी। बधाई।।।।।

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