Tuesday, November 21, 2017

अपनों का इंतजार....

बुझी हुई उन आँखों में
न नमी थी,
न कोई सपना,
न कोई अपेक्षा ।

बस राह को यूँ
निहार रही थी
मानो किसी अपनें
का इंतजार हो।

रूखे हुए उन होठों में
न कोई हंसी छिपी थी,
न कोई खुशी,
न अपने लिए कोई दुआ।

छुपा था, तो कुछ,
अनकही बातों का भंडार
जो निःशब्द थे अब तक,
मानो किसी अपनें से
हो बोलने का इंतेजार।

ढलते हुए तन को
न यौवन की चाहत
न मन में कोई शरारत
चाह थी किसी अपने की
जो मरते मन में प्राण फूँक दे।

हाथों में थामे,
बनाकर सहारा
एक लाठी को।

जब तक हाथों को थामने
उनका कोई ,अपना न हो।

शरीर जो था आत्मा विहीन
उस जगह पर।
जहाँ छोड़ गए थे वो,
जिनका अभिन्न अंग,
कभी रहे थे जो।

जरूरी न समझा उन्हें ,
साथ अपने रखना
क्योंकि अब माता पिता नहीं
बुजुर्ग बन गए थे वो।

बड़े बड़े सपने आंखों में
जो बस गए थे उनकी,
जो अपने थे
वही बन गए थे आंख की किरकिरी।

दो गज की भी जगह न थी,
उनके आशियाने में,
जिनके गर्भ में पलकर कभी
आनंदित हो रहे थे जो।

ध्यान रखना था जिनका ताउम्र
जिन्हें,
उन्ही को वृद्धाश्रम ,छोड़ गए थे वो।

अंतिम क्षणों में भी उनके
साथ नही थे वो,
कुर्बानियों भरा जीवन
जिनके लिए ,जी गए थे जो।।

अंतिम सांस ले गए थे वो।।
                           ~प्रियंका"श्री"
                              21/11/17

8 comments:

  1. बहुत ही ख़राब स्थिति है ये ... और लानत है ऐसी ओलाद पर ...
    रचना के माध्यम से दर्द बयान किया है आपने ...

    ReplyDelete
  2. जी दिगम्बर जी एक कोशिश की है उन माता पिता के ह्रदय की बात शब्दो मे गूथने की।

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