Friday, October 27, 2017

अनाथ हूँ मैं

अनाथ मैं,
हूँ वंचित सच्चे प्यार से
न समक्ष मेरे
माँ पिता का चित्र
हूँ अनभिज्ञ अपने आप से
न अपने अस्तित्व का ज्ञान है
न अपने जन्म का प्रमाण है
राह बस ताकता हूँ हर घड़ी
आये मुझे भी ले जाये कोई
दे अपनों सा लाड़ प्यार
हुकुम भी मेरा
सिर उठाये कोई
हर वक़्त नज़रें
उनको ही ढूँढती हैं
जब भी आता है
अनाथालय कोई
शायद हो यही मेरा अपना
बनाले मुझे अपना कोई
वक़्त ऐसा भी आता है
मुझे भी कोई अपनाता है
साथ जिसके रहता हूँ मैं
प्यार जिसको करता हूँ मैं
कहता हूं वो मेरे माता पिता हैं
उनका अकेलापन दूर करता जो  हूँ मैं
फिर किस्मत रुठ मुझसे जाती है
उनके घर उनकी अपनी औलाद आती है
जिस प्यार को मैने पाना शुरु किया ही था
उस प्यार में जंग लग जाती है
फिर हो जाता हूँ बोझ मैं
जिन हाथों से प्यार पाता था
उन से मार खाता हूँ मैं
अनाथ हूँ अनाथ ही मर जाता  हूँ मैं।।
                               ~प्रियंका"श्री"
                                  24/10/17

1 comment:

  1. अनाथ होने का दर्द ... ओह
    भावनात्मक रचना हेतु बधाई व शुभकामनाएँ

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