Saturday, March 28, 2020

सड़कों पर गुजरते लोग

सड़कों पर पड़े कंकणों की ये कैसी ध्वनि थी
जिसमें अश्रु पसीना लहूँ की नमी थी
हर एक कदम को छुआ था जिसनें
कुछ न कर पाने की तड़प थी जिसमें
शायद उसने भी चुभनें की चाह त्याग दी थी
होती भी क्यों नहीं
उनके पैरों में भूख प्यास की जो कमी थी।
प्रियंका श्री
28।3।20

Monday, March 9, 2020

होली एक निवेदन

                एक निवेदन

रंगों का त्यौहार आ गया । साथ लेकर आया हर्षोल्लास और ढ़ेर सारी मस्ती।
बस इस मस्ती और खुशियों के बीच अपने मित्रों, जानने वालों और सभी जनों से सिर्फ एक निवेदन करती हूं कि
होली का त्यौहार खुशियों को बांटने का त्यौहार है। पुराने पड़े गिले-शिकवे मिटाने का त्यौहार है। और इसे कृपया इसी रूप में मनाए।

इस त्यौहार न किसी बच्ची,लड़की व नारी के साथ दुर्व्यवहार करें। अगर उनका उत्तर आपके प्रश्न के एवज़ में "ना" निकले तो उसका अर्थ "ना" ही समझे व उसके अनुरूप ही शालीनता पूर्ण व्यवहार करें।

कृपया कर जानवरों को रंगों से युक्त पानी या किसी भी प्रकार का रंग न लगाये जो उनके शरीर के लिए हानिकारक सिद्ध हो।

होली मानने की खुशी में बड़ो का सम्मान न भूलें, होली में ली गयी ठंडाई आपको आपके संस्कार भूलने के लिए नही होती।

जानकर ऐसे काम न करें जिससे किसी का भी जीवन और हमारा पर्यावरण प्रभावित हो।

हर वर्ष पर्व मानव जीवन में खुशियों को मानने के लिए आते है न कि कष्ट व दुख देने को।

आप सब से विनती है कि धीरे-धीरे ही सही अगर शुरुआत एक ने भी कर दी तो पूरा समूह बनने में वक़्त नही लगेगा।

आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
प्रियंका"श्री"
9/3/20

Tuesday, November 19, 2019

मलाल

उनकी महफ़िल में मैंने ,
कितनों को कहते सुना है ,
सियासत के बादशाह ,
वो खुद के हुनर से नही ,
वजीरों की खुशामदों से बने है।
मलाल नही है मुझे,
सोच पे उनकी जो ,
जीत न सके तो ,
अब अफवाहों का,
बाजार ही गर्म कर चले।
काश कुछ वक्त ,
सुकून से बैठ ,
गर सोच लेते ,
खुद के बारे में भी,
तो आज इंसान भी ,
वो बहुत खूब होते।

प्रियंका "श्री"
19/11/19

Wednesday, October 30, 2019

दीवाली

हम शहर को रोशन करने में लगे थे
उनको अपने घर के चूल्हे की फिक्र थी

हम नए पकवानों से बस मुँह छू रहे थे
उन्हें दो वक्त का पेट भी पूरा भरना था

हम नये कपड़ो में इतरा रहे थे इस तरह
वो अपने तन को छुपाने में लगे थे

दीवाली आयी थी हमारे लिए दिखावा लेकर
उनके लिए था त्यौहार कुछ पाने की आस का।
                             प्रियंका"श्री"
                             30/10/19

Friday, September 27, 2019

रूबरू

गुमनाम हुए वक़्त गुजर गया,
चलो,
खुद से खुदको मिलाकर आते है।

बहुत बाँट लिया दर्द को अपने,
चलो,
अब खुद में सिमट जाते है।

मुस्कुराते चेहरों को देखते है
यहां सारे,
ज़ख्म जो तन में है वो,
दिख ही जाते है।

भीतर छुपे दर्द ए नासूर से
चलो,
ख़ुद ही अब रूबरू हो आते है।

ताब ए दर्द कुछ यूँ बड़ चला
है रूह पर,
खुद में ही खुद को अब,
ख़त्म हम कर जाते है।
             प्रियंका "श्री"
             28/9/19

Thursday, September 19, 2019

खटलापुरा घाट की घटना अप्रत्याशित या व्यवस्था में हुई चूक।


सवाल कई है। और जवाब सिर्फ कागजों पर ।ऐसे में लोगों का ग़ुस्सा जायज होता है। और होना भी चाहिए जब इन सवालों का जवाब हमेशा इंसानों की जान से जुड़ा हो।
कहते है कि भूतकाल में हुई घटनाएं सदैव मानव के वर्तमान और भविष्य को सचेतने का कार्य करती हैं। अगर ये सत्य है, तो आधी रात को भोपाल के खटलापुरा घाट पर वह घटना न होती जिसने इतने माओ के आँचल को ,परिवार के सहारों को ,हमेसा के लिए शांत कर दिया । 14 सितम्बर की वह रात एक काली रात की तरह भोपाल के पिपलानी स्थित 100 क्वार्टरस के घरों से उनके लालों को अपने आगोश में ले गयी और छोड़ गई उनके पीछे रोते- बिलखते उनके परिवार व दोस्तजन ।
उन युवाओं की आखिर गलती क्या थी? 
सिर्फ यही की 11 दिन के गणेश पूजन के बाद वे गणेश प्रतिमा का पूरी खुशी के साथ विसर्जन भी करना चाहते थे या  प्रशासन पर उनका विश्वास। कि प्रशासन के द्वारा किये गए इंतेज़ाम इतने पुख्ता है कि उन्हें डरने की आवयश्कता ही नहीं । शायद इसलिए पिपलानी स्थित क्वार्टरस 100 की "नवरात्रि गणेश उत्सव समिति" के युवाओं की टोली, 13 फिट ऊँची गणेश प्रतिमा लेकर विसर्जन के लिए "खटलापुरा घाट" पर करीब 3:30 बजे पहुँची,और विसर्जन की तैयारियों में जुट गई। तब किसे पता था? कि प्रतिमा के साथ क्या-क्या विसर्जित होने वाला है। और हुआ भी वही जिसकी कोई कल्पना भी नही करना चाहता।
जो एक संवेदनहीन और जानबूझ कर घटित होने वाली घटना थी। जिसमें दो नावों पर सवार कुल 22 लोगो मे से जिनमे 17 युवा और 5 नाविक थे उनमें से 11 युवा दोनों नाव का सुंतलन बिगड़ने से तालाब में डूबने से मृत्यु को प्राप्त हो गए।
इसे संवेदनाहीन इसलिए कहा क्योंकि जिस तरह वे नाविक अपनी जान बचाने के लिए खुद तैरक सुरक्षित पहुँच गए वही कुछ मासूम डूबते चले गए ।जबकि वे डूबते हुए बच्चों में से कइयों की जान बचा सकते थे ,पर वहां संवेदना खुद के प्रति ज्यादा दिखी ।वही प्रशासन की लापवाही का एक और खेल देखने को मिला । ऐसे कई बिंदु है जो प्रशासन को लोगो की नज़रों के कठघरे में खड़ा करता है जैसे
कलेक्टर के द्वारा धारा 144 के तहत दिए आदेशों का पालन न होना।
शाम 7 के बाद वोट  का संचालन बंद था,तो प्रशासन द्वारा इसकी अनदेखी क्यों कि गयी?
वोट में लाइफ जैकेट और सेफ्टी ट्यूब क्यों नही थी?
इतने सारे लोगो को एक साथ वोट में बैठने क्यों दिया गया?
बड़ी मूर्तियों के विसर्जन के लिए जब दूसरे घाट तैयार किये गए थे तब प्रशासन के लोगो ने इस घाट में आने की अनुमति क्यों दी?
बिना अनुमति प्राइवेट वोट कैसे घाट में मौजूद होकर काम कर रहे थे?
वही पुलिस,आपदा प्रबंधन, और निगम की सतर्कता में कमी क्यों आयी?
जब उस स्थान पर 52 पुलिस जबानों को तैनात किया गया था। तब घटना के वक़्त 25 पुलिसकर्मी गायब क्यों थे?
वही जब एसडीईआरएफ ने घाट पर मॉकड्रिल के दौरान 8 वोटों को उतारा था तो घटना के वक़्त सिर्फ 1 वोट ही क्यों थी और वो भी गश्त पर न होकर एक जगह खड़ी थी ?
और एसडीईआरफ के जवान क्यों तैनात नही थे? यदि जबान वोट के साथ तैनात होते तो शायद आज 11 जानें बच गयी होती।
वही निगम की बड़ी लापवाही सामने भी आई
कि घाट पर लगभग दो दर्जन नावों का अवैध रूप से संचालन कैसे हो रहा था ? जबकि इसकी जिम्मेदारी प्रशासन और पुलिस की थी कि वे अवैध रूप से नावों को संचालित होने से रोके।
वही बड़ी मूर्तियों के विसर्जन के लिए क्रेन की व्यवस्था यदि थी जो 10 फिट किनारे पर ही मूर्तियों की विसर्जित कर देती ,तो नाव को अंदर जाने की अनुमति कैसे मिली?
वही यह सवाल भी आता है कि घाट पर जब यह घटना घटित हुई तब गोताखोर क्यों नही थे ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एनजीटी द्वारा यह निर्देश दिए गए थे कि 6 फिट से ज्यादा बड़ी मूर्तियां नही बनेगी तो प्रबंधन ने इस पर संज्ञान क्यों नही लिया। शहर में बड़ी मूर्तियां कैसी बनी?
ये सारे ऐसे सवाल है जो प्रशासन को ,पुलिस को,और हर उस अधिकारी को दोषी मानते है जिन्होंने लोगो की जिंदगी से खेलने का जुम्मा उठाया। और उसकी भरपाई भी करी तो परिवारों को 13 लाख रुपये की राहत राशि देकर । मेरा एक सवाल हमेशा से रहता है क्या कोई भी राहत राशि उस घर के हँसते खेलते माहौल को फिर लौटा सकती है जवाब सबके पास है।बस तकलीफ इस बात की है कि क्यूँ प्रशासन किसी बड़ी घटना के घटित होने के बाद ही कठोर निर्णय लेता है और पूरी  सुरक्षा के इंतेज़ाम करने का फिर वही आश्वासन भी देता है। जिसमे से कई तो कागजों पर ही सुचारू रूप से चलित दिखते है बस हकीकत कुछ अलग होती है। मैंने जैसे पहले कहा था कि भूतकाल मानव को हमेशा सचेत करता है फिर वही भूल न करने के लिए। तो भी इंसान नही सचेतता । और यही इस घटना में भी देखने को मिला।
प्रशासन 2016 में हुई घटना से पूरी तरह से वाकिफ था इसलिये शाम के वक़्त नाव या वोट को पानी मे उतारने की मनाही थी। फिर भी इस आदेश को मानने की जरूरत नही समझी गयी। अगर हर एक अधिकारी अपने दायित्वों को पूरी जिम्मेदारी से निभाता तो एक साथ 11 घरों के रूदन की आवाज़ से हर किसी का हृदय यूँ फट नही रह होता। काश! जिन व्यवस्थाओं को भोपाल प्रशासन अब नवदुर्गा के आने के पहले करने को तैयार है उस वक़्त कर देता तो आज ये दु:ख का माहौल न होता।
प्रियंका खरे"श्री"
एमसीयू,भोपाल

Saturday, August 3, 2019

फ्रेंडशिप डे

मैं दिन तारीख के मामले में बहुत भुलक्कड़ हूँ ।हमेशा भूल जाती हूँ। रात को सोते हुए जब मोबाइल की स्क्रीन पर व्हाट्सएप्प ,मेसेंजर के आइकॉन दिखाई दिए तो लगा रात के 12 बजे के बाद ये संदेश कौन भेज रहा है देखा तो पुरान- नए सभी दोस्तों के फ्रेंडशिप डे विश करने के मैसेज थे ।देखकर खुशी हुई और नींद मेरी ,कहाँ भाग गई पता ही नहीं चला ।
पता खुशी क्यों हुई ? क्योंकि आज की भागदौड़ वाली लाइफ में जहाँ हमारे पास खुद के लिए वक़्त नही ,ऐसे में अपनों के लिए निकाल पाना मुश्किल होता है। पर इसके लिए पश्चिमी सभ्यता का आभार ,जिसने इन दिनों को घोषित करके उस कमी को भी दूर करने की पूरी कोशिश की।हालांकि हम भारतीयो को ऐसे दिनों की जरूरत पहले कभी नही पढ़ी, क्योंकि हम दिलों से जुड़ने वाले लोग है जो अच्छे बुरे हर समय अपनों को याद कर लेते है पर शायद इस चलन का अब बढ़ना इस बात को तो इंगित करता है कि शायद अब समय की मांग ही यही है । और मनुष्य होने के नाते समय के अनुरूप ढलना ही हमारा कर्तव्य भी । और हम सब ढल भी रहे है ।
पर आज भी जब मम्मी पापा की अपने ज़माने की बातें सुनती हूँ तो यही लगता है कि रिश्ते तो लोग उस वक़्त जीते थे। अब तो हम सिर्फ औपचारिकता ही कर रहे है । जब भी पापा से बात होती है पापा बताते है कि किसी भी वक़्त उनके दोस्त घर आ जाते थे और घंटों बातें हुआ करती थी। मम्मी कहती है कि पापा के दोस्तों से ही पापा के सीक्रेट मम्मी को पता चले और उस वक़्त पापा का ये कहना "हाँ सब कह दो भाभी को और लगा दो आग" कितने मज़ेदार पल होते होंगे न ।
मैं भी ऐसी ही दोस्ती की कमी का अनुभव करती हूं । जहाँ अपनो के लिए वक़्त हो, बातें हो ,मतलब मोबाइल पर नही सामने बैठ कर ढेर सारी बातें और मोबाइल उस वक़्त कहाँ हो किसी को पता ही न चले ,फिर से बचपन ,ज़वानी के दिनों में खोना ,कितना रोमांचक होगा न।
तो चलिए न ,इस फ़्रेंडशिप डे हम सिर्फ व्हाट्सअप ,कॉल मेरा मतलब है इस वर्चुअल दुनियां से दूर होकर अपने दोस्तों से खुद रूबरू क्यों न हो जाये ?उसने उनके हालचाल की पूरी दास्तान क्यों ले ली जाए, कुछ उनकी तो कुछ अपनी क्यों न कह दी जाए, प्यार गर बाँटने का नाम है तो चलो आज अपनों से बाँट ही लिया जाए।
सब रास्ते जब खत्म हो जाते है
खुल जाता है दरवाज़ा उसका
जिसको लोग दोस्त बुलाते है
मेरे सभी पागल दोस्तों को ,जिन्होंने मेरे मूडी मन को समझा और मुझे संभाला ...हैप्पी फ्रेंडशिप डे... हम तो आज ही मिलेंगें अपने जिगर के टुकूड़ों से...💐💐💐💐।
प्रियंका "श्री"
4/8/19

सड़कों पर गुजरते लोग

सड़कों पर पड़े कंकणों की ये कैसी ध्वनि थी जिसमें अश्रु पसीना लहूँ की नमी थी हर एक कदम को छुआ था जिसनें कुछ न कर पाने की तड़प थी जिसमें शायद...